आओ सुनाता हूँ मै गाथा
अपने हिन्दुस्तान की,
गौरवशाली इतिहास की
और व्यथित वर्तमान की ।
गंगा की निर्मल धरा से,
अपने हिन्दुस्तान की,
गौरवशाली इतिहास की
और व्यथित वर्तमान की ।
गंगा की निर्मल धरा से,
बाजार के मिनरल वाटर तक ।
स्वर्ण रजत की थालो से,
थर्मोकोल की प्लेटो तक ।
रिश्तो की गर्माहट से,
फेसबुक की चाहत तक ।
शास्त्रों के प्रज्ञान से,
गूगल के विज्ञान तक ।
सर्वेभवन्तु सुखिनः से ,
नक्सल आतंकवाद तक ।
अखंड भारतवर्ष से टूटते,
'खंडित' कश्मीर 'आज़ाद' तक ।
माता-पिता के चरणों से,
'मॉम-डैड' के कंधो तक ।
नारी शक्ति की पूजा से,
वेश्यावृत्ति के धंधो तक ।
विक्रम के न्याय से,
'राखी के इन्साफ' तक ।
गौ सेवा - ईश्वर सेवा से,
गौ चर्म के व्यापार तक ।
'नालंदा-तक्षशिला' को छोड़,
ऑक्सफोर्ड की चौखट तक ।
'विश्वगुरु' भारत से पीछे,
'प्रगतिशील' इस भारत तक ।
पर इस प्रगति की दौड़ में,
हम भूल रहे संस्कार को ।
भूल रहे संस्कृति व भारतीय आकर को ।।
बचा सको तो बचा लो,
इस देश को बाजार से ।
वरना बिक जायेगी ये सभ्यता
'उनकी' एक ललकार से ।।
1 टिप्पणी:
bahut achhi kavita h. sach me har chhetra ka marm pragat hota hai isme. -
prasoon parikh
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