शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

गाथा हिन्दुस्तान की...

आओ सुनाता हूँ मै गाथा
अपने  हिन्दुस्तान की,
गौरवशाली इतिहास की 
और व्यथित वर्तमान की 
 
गंगा की निर्मल धरा से,
बाजार के मिनरल वाटर तक
स्वर्ण रजत की थालो से,
थर्मोकोल की प्लेटो तक

रिश्तो की गर्माहट से,
फेसबुक की चाहत तक
शास्त्रों के प्रज्ञान से,
गूगल के विज्ञान तक

सर्वेभवन्तु सुखिनः से ,
नक्सल आतंकवाद तक
अखंड भारतवर्ष से टूटते,
'खंडित' कश्मीर 'आज़ाद' तक

माता-पिता के चरणों से,
'मॉम-डैड' के कंधो तक
नारी शक्ति की पूजा से,
वेश्यावृत्ति के धंधो तक

विक्रम के न्याय से,
'राखी के इन्साफ' तक
गौ सेवा - ईश्वर सेवा से,
गौ चर्म के व्यापार तक
'नालंदा-तक्षशिला' को छोड़,
ऑक्सफोर्ड की चौखट तक
'विश्वगुरु' भारत से पीछे,
'प्रगतिशील' इस भारत तक

पर इस प्रगति की दौड़ में,
हम भूल रहे संस्कार को
भूल रहे संस्कृति व भारतीय आकर को
बचा सको तो बचा लो,
इस देश को बाजार से
वरना बिक जायेगी ये सभ्यता
'उनकी' एक ललकार से

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

bahut achhi kavita h. sach me har chhetra ka marm pragat hota hai isme. -

prasoon parikh